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मेरा मन




प्रेम


मेरा मन मेरे बस में है
हाँ मै उसको चाहूँगा ।
न आये यह उसकी मर्जी 
मै भी नही बुलाऊंगा ।।

प्रेम सत्य है प्रेम भरोसा
प्रेम ब्रह्म लगता साकार ।
मै करता हूँ मै सुख पाता
जाये वह हो जहाँ विचार ।।

उसकी अनगिन साँसे चलती
हमको कभी नही है खलती ।
मेरी एक आह निकले तो
यह मेरी खुद- गर्जी  लगती।।

सपने देख रहा हूँ उसका
उसका मन है मत आये ।
मै भी तो हू मस्त फकीरा
इधर-उधर अब न जाये ।।

नही मानता प्रेम देह है
नही मानता काम नेह है ।
नही मानता स्वारथ सब कुछ
नही मानता वह विदेह है ।।

धारण धर्म प्रेम ही बल है
नैतिकता का उत्सव तल है ।
प्रेम विना जीना क्या जीना
यही त्याग है यही सुफल है ।।
डॉ दीनानाथ मिश्र

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3 Comments

Gunjan Kamal

09-Apr-2023 08:43 PM

बहुत खूब

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Sachin dev

07-Apr-2023 06:23 PM

Nice

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लाजवाब

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